Thought Of Swami vivekanand | अविचारित कर्मो का फल | Inspirational & Motivational Story

“Thought Of Swami vivekanand

एक गीदड जंगल में इधर-उधर चक्कर काट रहा था कि अचानक कुए में जा गिरा वह हाथ पेर मारता रहा, किन्तु कुए से बाहर न निकल सका। अंत में थककर सोचने लगा अब बाहर कैंसे निकला जाये। तभी अचानक वहां एक बकरा आ पहूंचा, वह अपनी प्यास बुझाने के लिए कुए की मुडेर पर आया और कुए में झांकने लगा।

कुए के अन्दर उसे एक गीदड दिखाई दिया। वह बोला- कौन ? गिदड भैया! कुए में क्या कर रहे हो ? क्या पानी बहुत ही ठंडा और मीठा हैं जो कुए में ही उतर पडे। गिदड ने हंसते हुए कहा – अरे बकरे भईया! बहुत प्यासे जान पडते हो । तुम भी आ जाओ और डटकर प्यास बुझाओ। पानी शरबत की तरह एक दम मिठा है। बस पीते जाओं, पानी हैं भी खुब सारा। तुम्हारे जैसे हजार बकरे पिये तो भी खत्म न हो।

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बकरे ने बिना सोचे विचारे ठंडे वे मीठे पानी के लोभ में छंलाग लगा दी। गिदड तो यही चाहता था। वह तत्काल पहली छंलाग में बकरे के सिर पर जा पहुंचा और दूसरी छंलाग में कुए से बाहर हो गया। बकरे ने घबरा कर कहा – यह क्या गीदड भईया तुम तो खुली हंवा मे पहुंचे, अब हम कैंस बाहर निकलेंगे। गिदड ने जवाब दिया – अब तुम अपनी मूर्खता पर आंसु बहाओ। जरासी समझ बुझ सेे काम लेते तो इस विपत्ति में क्यों फंसते ? मैं तो चला।

इस कहानी का सार यह हैं कि, अविचारित कर्मो का फल हमेशा दुखदायी होता है। किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणामों पर भलिभांति विचार कर लेना चाहिए। ताकि बाद में पछताना न पडे। अधिकतर सविचारित कर्म ही सुख देतें हैं | पूरी दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा, जो की अपने जीवन में इस बकरे की तरह बिना सोचे-विचारें मुसीबत में न फंसा हो |

और यह सब होता हैं, लोभ और अंधविश्वास के कारण | हमारे पास दो आँखें हैं, दो हाथ हैं, दो पैर हैं, खुद का दिमाग हैं, सोच विचारने की क्षमता हैं | तो जरा सोचो फिर हम क्यों किसी की बात को माने |

स्वामी विवेकानंद जी ने कहा हैं “चाहे कोई व्यक्ति कितना ही महान क्यों न हो, आंखे मूंदकर उसके पीछे मत चलो । यदि ईश्वर की ऐसी ही मंशा होती तो वह हर प्राणी को आंख, नाक, कान, मुंह और दिमाग़ क्यों देते ?”

तो अब आपको यह बात समझ आगई होगी, हमें किसी की बात मानने की जरुरत नहीं हैं, जरुरत हैं तो सिर्फ उस बात को जानने की – और जो जान लेता हैं, वह कभी धोका नहीं खाता |

जीवन में हर एक कदम होश से चलो कांटे चुभने का कोई सवाल ही नहीं होगा |

Thought Of Swami vivekanand